देवी

ऐसा क्या माँगा था उसने ,
जो तुम दे ना सके।
अच्छाई के देवता बनते हो,
इन्साफ तक तो कर ना सके।
हक़ ही तो माँगा था बराबरी का,
जो सदियों से उससे छीनते आये हो।
गलती है उसकी मांगती हैं , छीनती नहीं ,
भिखारियों के आगे क्या हाथ फैलती है।
कमजोर वो है नहीं, ना थी कभी ,
तुम उसकी भलमनसाहत का फायदा उठाते हो।
इंसान को इंसान तो समझते नहीं,
पत्थर की मूरत को देवी बनाते हो।

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ख़ूबसूरती

ख़ूबसूरती के नाम पर ये,
चेहरे बेदाग़ ढूँढता हैं।
रंगो से सजी इस दुनिया में ,
सिर्फ सफ़ेदी की वाह वाही करता हैं।
झुलस के दिन में , जिसकी चाँदनी से ठंडक पाता हैं ये ज़माना ,
ये तो उस चाँद को भी दागदार करार देता है।

नादां बादल

समाज के उन समझदार ठेकेदारों ने उस शहर के खूब टुकड़े किये ,
कभी जात पात तो कभी ऊँच नीच के नाम पे हिस्से किये।
लेकिन उन नादां बादलो की कारस्तानी तो देखो,
वे सबको एक सा भीगा कर दूसरे शहर चल दिए।

बारिश

कहा करते थे ना तुम ,
जब बुलाओगी मैं दौड़ा चला आऊंगा।

चाहे कोई बला हो सामने ,
मैं पल भर ना तुम्हे इंतज़ार कराऊंगा।

फिर क्यों तयशुदा मुलाक़ात भी नहीं हो पाई तुमसे,
इतने पहर के इन्तज़ार के बाद भी ?

खड़ी रह गयी मैं उस उफ़नती नदी के किनारे ,
और तुमने अपनी नामौजूदगी की वज़ह बारिश दी।

स्वावलंबी

खुश रहती थी वो अपनी दुनिया में,
सर पे पक्की छत ना सही, झोपडी उसकी अपनी तो थी।

कामना क्या करती वो छप्पन भोग की ,
पेट भरने को पकवान न सही , सुखी रोटी तो थी।

थक के जब आती वो काम से ,
मलमल का गद्दा न सही , नींद तो थी।

बचा नहीं पाती थी वो ज़रा भी अपनी कमाई से,
आधुनिक चीज़े ना सही, संतुष्टि तो थी।

पल भर में यूँ उजाड़ गया सब कुछ उसका ,
तूफ़ान कोई बड़ा नहीं, हलकी बारिश तो थी।

घूरती रही वो बादलो को, जैसे मांग रही हो हर्ज़ाना
जुट गयी फिर काम में, आत्मसम्मान की पक्की जो थी।

ज़हर

जो ग़ुरूर से तन के ना चलते तुम यूँ , तो आज सूखे पेड़ ना होते..
झुके जो ज़रा होते तो फलो से लदे होते।

जो बड़ा बनने की चाह में समंदर हो गए हो,
नदी जो होते तो इतने खारे नहीं होते।

संवेदना रहित जो हो तो ईमारत बन गए हो,
थोड़ी करुणा जो रखते तो किसी के घरौंदे होते।

जरुरत नहीं अब किसी की, अमीर जो इतने हो गए हो,
चार दोस्त होते मुश्किल में साथ, जो थोड़े गरीब होते।

काश के जो कर लेते हँस के किसी से दो मीठी बात,
ज़हर ना बनते जो इतने कड़वे ना होते !

मोहब्बत या दोस्ती

इज़हार जो किया था तुझसे मोहब्बत का,
तेरी ना सुन कर मेरी आँखे भर आई थी।
मेहरूम तो रह गई मैं मोहब्बत से ,
लेकिन तेरी रुस्वाई ने ही मेरी कलम से दोस्ती कराई थी।